यह शाम अब ढल ही जाए, तो अच्छा गम का साया निकल ही जाए, तो अच्छा आफ़त नहीं, यह तो इक महाप्रलय है मुलाकातों का सिलसिला थम ही जाए, तो अच्छा वीरान पड़ी कब से हर शजर इस शहर की परिंदा कोई आके बस ही जाए, तो अच्छा रौनकें बाजार में ग़र नहीं , तो क्या ग़म है? घरों में बाशिंदे बच ही जाएं, तो अच्छा मोहब्बत से खाली हुए जा रहे हैं पन्ने भले ही स्याही इंसानियत की बिखर ही जाए, तो अच्छा रूबरू ना मिल सको कुछ दिन, तो फिक्र नहीं फ़ोन पर गुफ्तगू चल ही जाए, तो अच्छा अरदास के लिए हाथ जुड़ गए हैं अब तो रहमतें खुदा की बरस ही जाएं, तो अच्छा.. credit:सीमा भाटिया