क्यों नहीं कर सकते

पत्नी की मदद

आज इत्तेफाक़ से

पत्नी से पहले मेरी आँख खुल गयी.

सोचा … कुछ मदद कर दूँ.

◆ आज चाय मैं बना देता हूँ. ◆

किचन में घुसा, तो

दूध की पतीली ढूँढने में

आधा घन्टा लग गया, और 15 मिनट

चीनी और चाय की पत्ती ढूँढने में.

चाय की प्याली उतार रहा था, कि

दूध उफन के बह गया.

उसे साफ करने लगा, तो

चाय ठंडी हो गयी.

एक घन्टे से ज़्यादा लग गया ….

जिस चाय को बनाने में,

वो मुझे 5 मिनट में चाहिये होती है,

अगर 5 मिनट से ज़्यादा लग जाये,

तो मैं शोर मचाना शुरु कर देता हूँ ~

अरे भाई ..!! चाय ही बना रही हो,

या पूरी दावत पका रही हो ?

अक्सर … जल्दबाजी में

उसका हाथ जल जाता है.

कई बार गरम तेल के छीटे पड़ जाते हैं.

मैं अक्सर देख के भी

अनदेखा कर देता हूँ.

कभी कह देता हूँ ~ थोड़ा सम्भल के

काम किया करो. पर क्या ????

हम लोग सम्भलने का मौका देते हैं

सोचा … जो बरतन गंदे हुए हैं ,

उन्हें ही धो लूँ.

सिंक में बरतन धोते हुए ….

कमर दर्द का एहसास और बढ़ गया.

मुश्किल था …

एक जगह खड़े हो कर बरतन धोना.

चलते फिरते काम करना

आसान होता है, पर एक जगह !!

सोचा … छोड़ दूँ , पत्नी धो लेगी.

उसे तो आदत है,

फिर अपनी ही बात पर

हंसी आ गयी, आदत है …

तकलीफ उठाने की.

कुछ हम पतियों की परवरिश भी

ऐसे होती है, कि हम हमेशा

ऐसे ही सोचते हैं , कि ….

हमारी जिम्मेदारी कमाना है, और

घर सम्भालना पत्नी की जिम्मेदारी है.

घर … ऐसे ही चलता है.

!!.. जी नहीं ..!!

घर ऐसे बिल्कुल नहीं चलता.

घर तो प्यार से चलता है,

परवाह से चलता है.

जहाँ पर एक दूसरे के काम

आसान किये जाते हैं.

एक दूसरे की मदद करके

एहसान नहीं जताया जाता.

एक दूसरे की तक्लीफें

समझी जाती हैं,

 

सिर्फ हम ही सारी तकलीफ उठा रहे हैं

ये नहीं सोचा जाता, क्योंकि

घर ऐसे ही चलता है.

 

आज एक प्याली चाय ने मुझे

बहुत कुछ सिखा दिया.

 

किचन के दरवाजे पर

पत्नी खड़ी मुस्कुरा रही थी.

 

मैंने देखते ही कहा ~

अब रोज सुबह की चाय

मैं ही बनाउँगा.

 

कम से कम एक प्याली चाय तो

पिला ही सकता हूँ …. तुम्हें रोज़.

Credit: शिव शुक्ल