प्रयाग शुक्ल द्वारा लिखित निबंध में लेखक ने भारत में हो रहे खान पान की दिनों-दिन बदलती तस्वीर के बारे में लिखा है। पिछले दस पंद्रह सालों में खानपान की तस्वीर में बड़ा बदलाव आया है। पहले मध्यम वर्ग के लोग साधारण भोजन से काम चलाते थे, जिसमें स्थानीय व्यंजनों का प्रमुख स्थान होता था। आजकल लोग भारत के विभिन्न प्रांतों के व्यंजनों का आनंद लेते हैं। आजकल फास्ट फूड ने हर घर में अपनी जगह बना लिया है और इनमें से कुछ व्यंजन तो हर उम्र के लोगों को पसंद आने लगे हैं। इनमें से अधिकतर व्यंजनों का इतना रूपांतरण हो चुका है कि उन्हें देशी स्वाद के अनुसार ढाल दिया गया है। फास्ट फूड ने कामकाजी महिलाओं के समय को बचा दिया है। लेकिन इन स्वादिष्ट व्यंजनों के कारण स्वाद और सेहत के साथ समझौता भी होने लगा है। जिससे आजकल लोग अधिक बीमार और आलसी होते जा रहे है। फास्ट-फूड का स्थानीय व्यंजनों की घटती हुई गुणवत्ता का उनके लगभग विलुप्त होने में एक बड़ा योगदान है।

अब लोग स्थानीय व्यंजन के अलावा दूसरे प्रांतों और दूसरे देशों के व्यंजन भी नियमित रूप से खाने और पसंद करने लगे हैं। आज कल की गृहिणियों को विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाने में महारत हासिल है। हमारे घर में भी फास्ट-फूड को बहुत पसंद किया जाता है। हमारे घर में तो फास्ट-फूड बनता ही है, कभी-कभी बाजार से बर्गर और पिज्जा मंगवा कर भी खाते हैं। खानपान में बदलाव के अनेक फायदे हैं। खानपान में बदलाव से न केवल हमारे भोजन में विविधता आती है बल्कि हमें अन्य प्रांतो और अन्य देशों की खान-पान और संस्कृति के बारे में जानने का अवसर भी प्राप्त होता हैं। हमारा संतुलित आहार ही हमारे स्वस्थ जीवन का आधार है, क्योंकि खान-पान में गड़बड़ी होगी तो हमारे जीवन में उसका बुरा प्रभाव पड़ेगा और हम अस्वस्थ होते जाएंगे। पौष्टिक भोजन हमें जीवन दान देता है तथा स्वस्थ शरीर प्रदान करता है। पौष्टिक भोजन का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण योगदान है, यह पौष्टिक भोजन ही हमें जीवन का वरदान भी देता है। आज-कल हमारे जीवन के तौर-तरीके, खानपान और पहनावे-ओढ़ावे में बड़ा परिवर्तन आया है।

पहले हम साधारण सा जीवन व्यतीत करते थे। सुबह उठकर तैयार होकर पूजा करना और काम पर जाना तथा शाम को घर आकर पूरे परिवार के साथ समय व्यतीत करना हमारी दिनचर्या थी। परन्तु आज हममें पार्टी करना, बाहर डिनर करना इत्यादि कई तरह के बदलाव सामने आए हैं। लेकिन हम यह भूल जाते है कि इस तरह का जीवन हमारे समय को बर्बाद कर रही है। लोग अब दाल, चावल, रोटी सब्जी से तंग आ चुके हैं। फास्ट-फूड ने इनका स्थान ले लिया है। आजकल लोग घर का खाना भुलकर बाहर के अपौष्टिक खानों फिजुल के खर्च करते हैं।

खान-पान के साथ हमारा पहनावा भी बदलते जा रहा है। भारतीय पहनावे तो अब किसी त्यौहार या विवाह आदि अवसरों पर पहने जाते हैं। पहले पहनावा मनुष्य के शरीर को ढकने तथा ठंड से बचने के लिए पहना जाता था। परन्तु आज वह स्वयं को विशिष्ट दिखाने का साधन है। इसमें हम भारतीय रोजाना हज़ारों रूपए खर्च करते हैं। पहले हम जिन खाने की चीजों को हर गली में आसानी से पा लिया करते थे, आज हम उन्हीं पकवानों को खास दुकानो में ढुंढ़ते-फिरते है। खानपान की यह बदलती यह स्थिति हमारे समाज तथा देश के लिए नुकसान दायक है।