चिड़चिड़ी होती हैं स्त्रियाँ
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जी, बहुत चिड़चिड़ी होती हैं स्त्रियाँ
बात – बात पर बमक पड़ती हैं
खीझ उठती हैं
उबल पड़ती हैं
चीखती – चिल्लाती हैं
और कुछ न बन पड़ा तो
आँसू बहाती हैं
कितनी चिड़चिड़ी होती हैं स्त्रियाँ
उन्हें ऐसा तो नहीं होना चाहिए
तो क्या हुआ
अगर कुछ मनचलों की नज़रें
उनके न चाहने पर भी उन्हें छू लेती हैं
तो क्या हुआ अगर कम उम्र से ही
वो सहती हैं कमर, पेट व
हड्डियों का दर्द प्रतिमाह
तो क्या हुआ अगर वो अपने बचपन का
घर – आँगन बिसराकर
किसी और के आँगन की
शोभा बन जाती हैं,
किसी और परिवार को
अपना बनाने में जुटी रहती हैं
तो क्या हुआ अगर वो
नौ मास गर्भावस्था की यातना सह
अपने रक्त, मज्जा, मांस से
एक नवजीवन रचती हैं
तो क्या हुआ अगर
वो दूध के रूप में अपना रक्त पिलाकर
मानव में जीवन का संचार करती हैं
तो क्या हुआ अगर वो
अपने परिवार के लिए
अपने सपनों का त्याग करती हैं
तो क्या हुआ अगर वो
कामकाजी होते हुए भी
घर में अधिक काम करती हैं
तो क्या हुआ अगर चालीस के बाद
उनके मासिक चक्र में बदलाव
उन्हें अंदर ही अंदर खोखला करता है
तो क्या हुआ अगर वह आए दिन
कन्या – भ्रूण हत्या, तेज़ाब-हमले,
दहेज की आग में लड़कियों के जलने
और बलात्कार जैसी खबरें सुनकर
विचलित होती हैं
तो क्या हुआ अगर वो
कन्यादान, पराया धन, अबला
जैसे विशेषणों से नवाज़ी जाती हैं

तो फिर क्या हो गया
इन सबके बावजूद भी स्त्रियों को
चिड़चिड़ा तो नहीं होना चाहिए
पर, अफ़सोस वो चिड़चिड़ी होती हैं

लेकिन यह भी सत्य है कि
दुनिया में इस तरह जो
रंग, ख़ुशबू, चहक और चमक बिखरी है
वो सब
इन चिड़चिड़ियों की वजह से ही है ।

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