भारत में सनातन संस्कृति के लोग आए दिनों अलग-अलग त्यौहार मनाते रहते हैं। भाद्रपद महीने में कृष्ण जन्माष्टमी के बाद अब गणेश चतुर्थी का त्यौहार आने वाला है।

सनातन संस्कृति के लोग किसी भी देवी देवता की पूजा करने से पहले भगवान श्री गणेश की पूजा करते हैं। भगवान श्री गणेश को विनायक, गजानन, एकदंत और विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है।

आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताते हैं कि गणेश चतुर्थी से जुड़ा हुआ इतिहास क्या है और किस प्रकार गणेश चतुर्थी मनाने की शुरुआत हुई। साथ ही साथ हम आपको यह भी बताएंगे की गणेश चतुर्थी 2022 में कब मनाई जाएगी तथा इसे मनाने का शुभ मुहूर्त क्या होगा।

गणेश चतुर्थी क्या होती है? –

गणेश चतुर्थी हिंदुओं का एक विशेष त्यौहार है जिसे भगवान श्री गणेश के जन्मदिन के उपलक्ष्य के रूप में मनाते है। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश उत्सव के नाम से भी जाना जाता है।

महाराष्ट्र में विशेष रूप से गणेश चतुर्थी महोत्सव को धूमधाम से मनाया जाता है जो 10 दिनों तक चलता है। गणेश उत्सव के दौरान चतुर्थी के दिन महाराष्ट्र और भारत के अन्य हिस्सों में लोग अपने घरों में तथा कई सार्वजनिक स्थलों पर भगवान श्री गणेश के मूर्ति की स्थापना करते हैं और लगातार 10 दिनों तक अपने रीति-रिवाजों के साथ विधिवत उनकी पूजा अर्चना करते हैं।

गणेश चतुर्थी मनाने की तिथि 

हिंदू पंचांग के अनुसार गणेश चतुर्थी का व्रत एवं त्यौहार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है।

इस दिन गणपति की स्थापना के साथ शुरू होने वाला गणेश उत्सव अगले 10 दिनों तक मनाया जाता है और ठीक अगले दसवें दिन अनंत चतुर्दशी को गणपति विसर्जन के साथ यह महोत्सव समाप्त होता है।

हिंदू पंचांग के मुताबिक गणेश चतुर्थी का व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन रखा जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस वर्ष 2022 में गणेश चतुर्थी 31 अगस्त के दिन पड़ रही है जो आने वाले अनंत चतुर्दशी तक गणेश उत्सव के रूप में मनाई जाएगी।

गणेश चतुर्थी 2022 का शुभ मुहूर्त

31 अगस्त 2022, सुबह 11:05 से लेकर लगभग 1:30 तक भगवान श्री गणेश की पूजा का शुभ मुहूर्त है इसके अलावा सुबह 5:58 के बाद से दोपहर 12:12 तक रवि योग में भी गणेश जी का पूजन शुभ फलदाई है।

गणेश चतुर्थी कथा –

गणेश चतुर्थी भगवान श्री गणेश की जन्म तिथि से जुड़ी हुई एक कथा अत्यंत लोकप्रिय है। कहा जाता है कि एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थी उस दौरान उन्होंने अपने शरीर पर लगे लेप अथवा मैल के जरिए एक काया बनाई और उसमें प्राण डाल दिए ताकि उनके द्वारा बनाया गया बालक द्वार पर पहरेदारी कर सके। यही बालक भगवान श्री गणेश थे जिन्हें माता पार्वती ने अपने शरीर के लेप से निर्मित किया था।

माता पार्वती ने गणेश जी को आज्ञा दी कि वह द्वार पर ही रुक कर पहरेदारी करें और किसी को भी अंदर आने की अनुमति ना दें। इतना कहकर माता पार्वती अंदर स्नान करने चली गई और भगवान श्री गणेश द्वार पर पहरेदारी करने लगे।

कुछ समय बाद भगवान शंकर आए और द्वार से अंदर प्रवेश करने लगे इस पर माता की आज्ञा का पालन करते हुए भगवान श्री गणेश ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। भगवान शिव ने गणेश जी से उनका रास्ता छोड़ने के लिए कहा लेकिन गणेश जी एक आज्ञाकारी पुत्र की तरह माता पार्वती की आज्ञा का निर्वहन करते रहे।

इस पर भगवान शिव अत्यधिक क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल के जरिए भगवान श्री गणेश के सर को उनके धड़ से अलग कर दिया।

गणेश जी की चीख सुनकर जब माता पार्वती बाहर निकलती हैं तो गणेश जी का कटा सिर देखकर रोने भी लगने लगती हैं और शंकर भगवान को बताती हैं कि आप उनके द्वारा बनाया गया उनका पुत्र था। माता पार्वती भगवान शिव से गणेश जी को जीवित करने का आग्रह करती हैं।

तब भगवान शंकर अपने सेवकों को आज्ञा देते हैं कि वे लोग धरती पर जाएं और जिस बच्चे की मां अपने बच्चे की तरफ पीठ करके सो रही हो उसका सर काट कर लाएं। जब भगवान शिव के सेवक पृथ्वी लोक पर जाते हैं और एक हाथी के बच्चे का सर काट कर वापस कैलाश आते हैं।

भगवान शिव इस गजमुख को गणेश जी के धड़ से जोड़ देते हैं और प्राण मंत्र पढ़कर उन्हें जीवनदान देते हैं। इसी कारण भगवान श्रीगणेश को गजानन भी कहा जाता है।

गणेश महोत्सव मनाने की विधि –

गणेश चतुर्थी व्रत के साथ ही गणेश महोत्सव की शुरुआत होती है तथा अनंत चतुर्दशी तक मनाई जाती है।

गणेश महोत्सव मनाने के लिए कुछ विशेष प्रकार के यज्ञ अनुष्ठान किए जाते हैं।

  • प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान के दौरान भगवान श्री गणेश की मूर्ति स्थापना की जाती है और पुनः 16 रूपों में भगवान गणेश को श्रद्धा सुमन अर्पित किए जाते हैं और पूरे विधि विधान के साथ अगले 10 दिनों तक उनकी पूजा की जाती है।
  • लड्डू और मोदक भगवान गणेश के प्रिय व्यंजन माने जाते हैं इसके अलावा भी बहुत से पकवान बनाकर भगवान श्रीगणेश को चढ़ावा चढ़ाया जाता है।
  • गणेश महोत्सव का अगला अनुष्ठान उत्तर पूजा होता है स्थापना के बाद इस अनुष्ठान को किए बिना मूर्ति को कहीं ले जाया नहीं जा सकता। इसलिए उत्तर पूजा का अनुष्ठान करके गणेश जी की मूर्ति को विस्थापित किया जा सकता है।
  • गणेश महोत्सव का अंतिम अनुष्ठान गणपति विसर्जन होता है जिस दौरान भगवान श्री गणेश की स्थापित मूर्ति को जल में विसर्जित कर दिया जाता है। इसी विसर्जन के साथ गणेश महोत्सव का समापन हो जाता है और समापन के उपलक्ष में भंडारे इत्यादि का आयोजन किया जाता है।

गणेश चतुर्थी से जुड़े रोचक –

ऐसी मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन रात के समय चांद नहीं देखना चाहिए। गांव देहात में चतुर्थी को ढेलही चौथ भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो लोग इस दिन रात के समय चांद देख लेते हैं उनके ऊपर कलंक लग जाता है।

देहात में गणेश चतुर्थी की रात चांद देखने से जुड़ी एक अजीबोगरीब मान्यता यह भी है कि अगर किसी ने चांद देख लिया है तो उसे अपने पड़ोसियों के छत पर पत्थर फेंक देना चाहिए लोगों का मानना है कि ऐसा करने से कलंक और दोष नहीं लगता।

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